चाँद !

ढलते हुए सूरज ने कहा,
ऐ ! चाँद आ अब तू कर रोशन यह जहाँ ,
बिखेर कर अपनी चांदनी यहाँ,
बाँध ले यूँ अपना समां !
 
यह रात है  चार पहर की,
जला के अंधियारों  में दिए,
तू बन जा इस जहाँ का
सब से प्यारा मितवा!
 
फिर सुबह की किरणों से,
यह खो जाएगा आसमान,
जहां चाँद होता है ज़मीन पर ,
तारे जगमगाते  आसमान !
 
 

मन ! एक कमल !

कोमल कमल की पंखुरियों सा निर्मल,
खिलता ,प्रफुल्लित मन यह चितवन,
धरा की रेखाओं के आधीन ,
फिर भी उन्मुक्त  स्वाधीन स्वच्छ दर्पण
 
सदेव खिलता खिलखिलाता ,

अपने मन मोहक गीत सुनाता,
लुभावना सा यह कमल ,
सुवासित रहे वातारण .
 
 
कभी जो तूफ़ान में झुक के,
मुड़  जाए इसके डंठल ,
अगले पल अपने को संभाले,

खडा रहे यह मनभावन .
 
ऐसे निर्मल मन सा कोई हो जो कमल,
जीवन की डोर से फिर न टूटे ….
किसी की साहस का बंधन।

एक नज़र

एक नज़र के लिए है सारा फ़साना,
ज़िन्दगी का यह अफसाना
न जाने किस दिन मिलेगा ,
इस दिल को अपने प्यार का नजराना .
मुद्दत सी हुई,
जब मिले थे यूँ हंसके,
बैठे थे यूँ खामोशी में,
नज़र्रें झुका के,
हवा ने भी रुख मोड़ लिया तब,
जब एक नज़र मिली आपकी हमसे।
आज इतने अरसो बाद,
यह लगा है फिरसे
ना जाने कितने जनम लगेंगे …
हमें …
आपके दिल में अपनी मोहब्बत जगाने …
एक नज़र को तड़प रहे हैं हम बेगाने।

TUM !

दो पल का इंतज़ार न था,
यह सदियों की थी दूरी,
इन दिनों देता नहीं,
यह दिल किसी बात की मंजूरी …
हलके से, चुपके से ,
इन आँखों के झरोखे से ,
सपनो के बगीचे  में  ,

 जब तुम आते हो होले से ,
पलक झपकते ही हो जाते …
अन्तेरध्यान इन नज़रों से …
मंद मंद मुस्कुरा हम,

 

जीते हैं इन यादों के सहारे,

 

इस तमन्ना में,

 

की तुम आओगे जल्द ही पास हमारे।

 

 

Kanha!

शीश पर मोरमुकुट सजे,
होंठों पर बांसुरी सुरीली,
वृन्दावन के कुञ्ज गली में,
घर घर देखि मोहन की छवि!
चहुँ और है एक उजियारा,
हरी के नाम से गया अँधियारा,
नेत्रहीन सूरदास गाये,
गीत कान्हा के उपमाओं का।
क्या कहें मीरा की तान,
राधा भी झूमे मुरली में ध्यान,
प्रकृति के कण कण में बसा
वही एक कान्हा का नाम।
में तो देखू छाया उनकी ..
प्रत्येक जीव के रोम रोम में,
कान्हा तेरे दरस के लिए।।
वन वन घूमे बावरे.
कह दे तू कहाँ है छुपा
किस मन मंदिर में बसाए
अपना स्थान
इस क्षण में कहाँ है रमा।
किस कण में है तेरे प्राण!

MUSKAAN

चुपके से आई है किरणों के सहारे ,
यह प्यारी सी मुस्कान जो खोयी थी किनारे ,
चलते चलते जम तुम चले कहीं और ,
ले गए थे तुम्हारे साथ हमारे हंसने की डोर .
कई दिनों बाद आज सूरज है निकला ,
बादलों के पीछे से उजाला है चमका ,
हलकी सी मुस्कान इन होठों पर आई है,
जब कई दिनों बाद इस दिल को तुम्हारी याद आई है .
कहीं से आज एक मस्त झोंखा चला है ,
उड़ा के मेरा आँचल हवा में वोह बहका है,
साथ अपने उसने तुम्हारी खुशबु लायी,
आज कई दिनों बाद होंठों पर हंसी आई है

PIYA!

सखी ऱी ! पिया न जाने मोहे मनन की बात ,
कह न सकू में बात यह मन की,
ना वोह समझे बात मिलन की,
कैसे कहूँ उन्हें यह उलझन सी!
सखी! री पिया न समझे बात !
इन नयनों में वोह ही बसे हैं दिन रात ,
आँखें मूंदू या फिर जागू हर रात ,
पलक झपकते जाने क्या हो जात !
सखी ! री ! कासे कहूँ यह बात!
फूल यह मन का खिलने को है तैयार,
देख इसे वोह ना समझे कोई बात ,
मुरझा के बैठा है यह अपने डाल !
सखी ! री पिया न समझे बात!
जाकर उनसे कह दो तुम एक बार ,
कहना पि से मिलने को हूँ तैयार ,
नदिया किनारे ..जिस घट पुष्प हज़ार ,
चाँद भी होगा जलने को तैयार …
सखी ! री ! बस कह दो यह बात!
अब न रह सकू उनके बिना एक रात,
आकर जला दे,
इस ज्योति की बात ,बनके दिया वह रख ले अपने पास!

MAN MEIN BASANT

अम्बुआ की डाली पर
बैठी कोयल गा रही मल्हार ,
सुना रही हमे गीत लिए प्यार की पुकार ,
चहू और है बसंत का मौसम मनमोहक
है सारा जहां …
दखे इसे मन नाच उठा जैसे,
पायल की झंकार …
सुगंध फैली है जैसे की कस्तूरी मृग
का सुवास,
दूँ ढ रहा जैसे वन उपवन में
लिए अपने भीतर
ही जिसका वास …
रंग बिरंगे फूलों से सजा है ,
यह सारा निरIंकार ,
मानो धरती कर रही हो जैसे
कोई अमृत संचार …

Yaad

ना जाने कब आएगी उन्हें हमारी याद ,
चन्द लब्ज़ कहेंगे वो यह ख्वाब है मेरा ,
अरसा बीत गया यु ठहरे हुए,
ना वो आये न उनकी शब्दों की बौछार।
किस कदर हम रहते हैं ,
दिन रात यु ही हालात ,
जाने कौन घडी में ..बुझेगी
इस जीवन की यह प्यास।
अब के आँखें तरस गयी,
करने को तुम्हारा दीदार ,
बरसों बाद यु लगा ..
जैसे तुम मिल गए हो … और मिल जाएगा तुम्हारा प्यार।

Boondein!

Tapakti hui aasman se chand boondein pyar ki,

bhiga gayi mere aangan ko tere  dil ki yeh nami,

in boondon mein mujhe bheeg jaane do kabhi,

jise dekh baarish  bhi rah jaaye tham kar wahin !