Kanha!

शीश पर मोरमुकुट सजे,
होंठों पर बांसुरी सुरीली,
वृन्दावन के कुञ्ज गली में,
घर घर देखि मोहन की छवि!
चहुँ और है एक उजियारा,
हरी के नाम से गया अँधियारा,
नेत्रहीन सूरदास गाये,
गीत कान्हा के उपमाओं का।
क्या कहें मीरा की तान,
राधा भी झूमे मुरली में ध्यान,
प्रकृति के कण कण में बसा
वही एक कान्हा का नाम।
में तो देखू छाया उनकी ..
प्रत्येक जीव के रोम रोम में,
कान्हा तेरे दरस के लिए।।
वन वन घूमे बावरे.
कह दे तू कहाँ है छुपा
किस मन मंदिर में बसाए
अपना स्थान
इस क्षण में कहाँ है रमा।
किस कण में है तेरे प्राण!

6 विचार “Kanha!&rdquo पर;

  1. Beautiful!
    I have heard that the krishna raas still occurs in the vans of vrindavan and the musical paranoma fills the air(though seeing it is forbidden, whoever does, loses his/her eyesight or sense)
    Krishna is the first “Romeo” of the Paradise and the best one in them, not forgetting the relics and his highness’es authority…

    Hope, Kanha ji forgives me for calling him “Romeo”…😉 cutest and best…

    “Rash-rachiya” and our “Makahn Chor”😀

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