जज्बा

ना रोकना इस जज्बे को जो निकला है अपना रूतबा लिए,
आत्मसम्मान के इस लडाई में रख अपने शीश उठाये हुए,
कभी कभी ही ऐसे जोश में रहता है इंसान यहाँ,
बुझने न देना इस आग को जबतक न हो इन्साफ यहाँ .
 
 
बदल के रखेंगे हम हवाओं की दिशा जो हमसे टकराएगी,
देश के लिए मरना जाने तो क्या अपना हक न मांग पाएंगी ,
जागो सोये हुए लोगों ,घर तुम्हारा भी जल जाएगा ,
अगर न मोड़ा इस आंधी को तो सर्वस्व ही मिट जाएगा।
 
 
आँखें खोलो ,मन से सोचो ,क्या ऐसी दुनिया हम चाहेंगे,
मनुष्य जहाँ बना जानवर ,जंगल राज में खुला हुआ, 
शर्म गृना से झुक  गया सर   … ऐसा काम न अब हो,
वर्ना महाभारत भी यहीं हुआ था  … भूलना मत ये दोस्तों।
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नदिया

अल्हड बन कर घूम रही है, 
ये नदिया वन वन,
कभी पहाड़ों पर  चढ़ती ,
कभी भागती और दौड़ती …
 
गाँव गाँव , जंगल की  छांव  ,
मुडती ,घुमाती ये सर सर नाव,
किधर का रुख  लिए 
जा रही …
ये इठलाती चंचल नदिया!
 
 
हंसती, मुस्कुराती , 
खिलती खिलखिलाती ,
कुछ ही पल में चुप हो जाती,
सरल बन धीरे धीरे बहती!
 
 
समझ  न सके कोई 
इस के तेवर 
क्या संजोये है 
ये भीतर!
कितने मोती जेवर ,
कितने रत्न जडित है 
इसके तन पर!
 
 
फिर भी सरल सौम्य  रूप धारे,
चलती है ये राह निरंतर
प्रकृति के इस आलंकार  पर,
शत शत प्रणाम करूँ   मैं  इश्वर! 

दर्शन

मृग तृष्णा की भाँती कहाँ भटके है तू  वन वन,
जिसके लिए तरस जाए आँखें,
वो मिलेंगे तुझे अपने अंतर मन,
ह्रदय कमल के पुष्प कुञ्ज में,
विराजे वो जैसे ब्रह्मकमल !
 
 
ध्यान,तप , हवन ,कर  भी ,
जब न हो उनके दर्शन ,
तब खोल किवाड़  अपने मन के,
झांक ले  तनिक तू भीतर !
 
 
अपने बिगड़े कामो को जब,
मिले न कोई राह निरंतर ,
तब तूने है याद किया उसे ,
जो राह तक रहा था तेरी …
लिए प्रेम की धारा अविरल !
 
 
आज दिनों के बाद याद करे जिसे,
वो बैठा है धुनी रमाये इधर,
बाँट देखे उस भक्ति सुधा  की,
जो बहने को हो तैयार इस डगर !
 
 
मन की आँखें   खोल के ज़रा ,
तू ध्यान कर उसका अगर,
खिल जाएगा पुष्प ह्रदय का,
और  दर्शन देंगे परम हंस .

चांदनी

गरजते हुए बादलों के पीछे से शरमाई चांदनी झांक रही ,
कभी डर  के कभी सिहर के देख रही,
ठहरी सी लहराई सी,
हवा के साथ गुनगुना रही।
 
न फ़िक्र है उसे बिजली की गरज से,                         
न जाने वो काले बादलों क साए को,
बस अपने में ही चलती जा रही,
चारो ओर  अपनी हंसी बिखरा   रही ।
 
सफ़ेद झिलमिलाती चादर सी आँगन में,
वो अपने साथ लिए प्यार को दामन में,
चलती  यूँ मीलों खामोशी से,
ख़ुशी की रोशनी जगमगा रही .
 
निर्मल चांदनी का ये दर्पण,
चारों ओर लाये उजियारा ,
घने काले बादल हट जाए,
देख कर इसकी अनोखी अदा!
 

चलते रहना!

जज्बा लिए इस दिल में जब उठते  है कदम ,
मंजिल भी नज़र आती है ,
चाहे हो मीलों दूर अगर !
 
बिना रुके बिना थमे ,
कांटो प् चलना है अगर,
तो डर को  क्यूँ जगह दे मन में ,
जो बढ़ा  देता है फासले मंजिल की अगर!
 
 
गिरना,उठना,
ये तो है इस राह के हमसफ़र,
डरता क्यूँ है ऐ दिल,
जब थामने वाला हो साथ अगर!
 
 
चाहे हो नदी,या हो पर्वत,
आंधी में हो चलना या हो अंधेरा चमन,
विश्वास के दिए को जलते रख कर,
तू बस चल अपनी डगर!
 
बीच मजधार गर फँस जाओ  कहीं ,
याद रखना ऐ हमसफ़र,
एक हाथ साथ है तुम्हारे,
हर वक़्त,हर  पल, शामोसहेर !

Bachpan!

किनारे बैठे , रेत की बाहों में,
चुपके से सरक कर पानी की लहरों में ,
हो गया ओझल इन आँखों के झरोखे से,
वो नन्हा सा एक खिलता हुआ बचपन!
गीली रेत में घरोंदे बनाता ,
अपने नाम से उसे सजाता,
लहरें जब उसे मिटाती ,
फिर नन्हे हाथों से नया घर बनाता !
ना थकता कभी न होता मायूस,
करता कोशिश जब तक न बना मगरूर,
इस बचपन को समाये दिल में रखा था,
लगता है वो लहरों के साथ चला गया !
गर करू में कोशिश आ जाये वो ,
मन की गहराईयों में छुपा लूँ तोह,
फिर से खिल जाएगा ये चेहरा ,
जिसकी मुस्कान खो गयी थी यूँ !
फिर से मन  में  जज्बा होगा ,
ज़िन्दगी को नया रुख मिलेगा,
हँसते हँसते चलने का सबब ,
इस दिल को भी तो अच्छा लगेगा!

UD JAA!

पवन की चाल चलता ,तीव्र गति से उड़ता ,
पंख लिए सपनो के ,
मन यह चंचल सा !
 
 सफ़ेद  अश्व पर हो सवार जैसे कोई सतरंगी सपना,
 आँधियों  को चीरता  हुआ ,
आसमान में उड़े यह गीत नया सा!
 
 
 
जज्बा कोई दिल में हो रंग भले ही कोमल ,
धड़कन में वह जान संजोये ,
लेता है अपनी डगर !
 
किस डर में जिए तू ऐ मन  ,
किसके लिए सजाये,
सपनों को तू भो पंख लगाकर,
उड़ जा देश पराये!