Bachpan!

किनारे बैठे , रेत की बाहों में,
चुपके से सरक कर पानी की लहरों में ,
हो गया ओझल इन आँखों के झरोखे से,
वो नन्हा सा एक खिलता हुआ बचपन!
गीली रेत में घरोंदे बनाता ,
अपने नाम से उसे सजाता,
लहरें जब उसे मिटाती ,
फिर नन्हे हाथों से नया घर बनाता !
ना थकता कभी न होता मायूस,
करता कोशिश जब तक न बना मगरूर,
इस बचपन को समाये दिल में रखा था,
लगता है वो लहरों के साथ चला गया !
गर करू में कोशिश आ जाये वो ,
मन की गहराईयों में छुपा लूँ तोह,
फिर से खिल जाएगा ये चेहरा ,
जिसकी मुस्कान खो गयी थी यूँ !
फिर से मन  में  जज्बा होगा ,
ज़िन्दगी को नया रुख मिलेगा,
हँसते हँसते चलने का सबब ,
इस दिल को भी तो अच्छा लगेगा!

14 विचार “Bachpan!&rdquo पर;

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