चांदनी

गरजते हुए बादलों के पीछे से शरमाई चांदनी झांक रही ,
कभी डर  के कभी सिहर के देख रही,
ठहरी सी लहराई सी,
हवा के साथ गुनगुना रही।
 
न फ़िक्र है उसे बिजली की गरज से,                         
न जाने वो काले बादलों क साए को,
बस अपने में ही चलती जा रही,
चारो ओर  अपनी हंसी बिखरा   रही ।
 
सफ़ेद झिलमिलाती चादर सी आँगन में,
वो अपने साथ लिए प्यार को दामन में,
चलती  यूँ मीलों खामोशी से,
ख़ुशी की रोशनी जगमगा रही .
 
निर्मल चांदनी का ये दर्पण,
चारों ओर लाये उजियारा ,
घने काले बादल हट जाए,
देख कर इसकी अनोखी अदा!
 

9 विचार “चांदनी&rdquo पर;

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