दर्शन

मृग तृष्णा की भाँती कहाँ भटके है तू  वन वन,
जिसके लिए तरस जाए आँखें,
वो मिलेंगे तुझे अपने अंतर मन,
ह्रदय कमल के पुष्प कुञ्ज में,
विराजे वो जैसे ब्रह्मकमल !
 
 
ध्यान,तप , हवन ,कर  भी ,
जब न हो उनके दर्शन ,
तब खोल किवाड़  अपने मन के,
झांक ले  तनिक तू भीतर !
 
 
अपने बिगड़े कामो को जब,
मिले न कोई राह निरंतर ,
तब तूने है याद किया उसे ,
जो राह तक रहा था तेरी …
लिए प्रेम की धारा अविरल !
 
 
आज दिनों के बाद याद करे जिसे,
वो बैठा है धुनी रमाये इधर,
बाँट देखे उस भक्ति सुधा  की,
जो बहने को हो तैयार इस डगर !
 
 
मन की आँखें   खोल के ज़रा ,
तू ध्यान कर उसका अगर,
खिल जाएगा पुष्प ह्रदय का,
और  दर्शन देंगे परम हंस .

8 विचार “दर्शन&rdquo पर;

  1. mujhe lag raha hai aapne hindi mein bhi ” visharad ” ki upadhi zaroor hasil ki hai, kyuon ki shabda dimag se nahi sidhe hirday se utre dikhayi de rahe hai.

    Aap jitni sundar ho use jyada aapka hirday sundar hai ye ehessa bahut gehre mein piath gaya hai

    Aur doosri baat usee jyada aapka vyaktimatva sundar lagne laga hai
    Aur aapke hirday ki kya baat kahe……….nishabd

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