यूँ ही !

बस कह दिया तुमने… न देखना कभी ,
गर जाओं भी  तुम मेरे  सामने से कहीं ,
इस गली में न तुम आना कभी,
जब तक है मेरी यहाँ बंदगी।

अब क्या करे ये मन जो ना समझे कभी ,
बंद आँखों से जिसने देख ली दुनिया तेरी,
आवाज़ भी जिसने सुन ली दिल की ,
पर होंठ सिल गए है ,क्यूँ की तुम ना चाहो अभी  ….
की कोई लब्ज़ निकल जाए यूँ ही कभी …
और पलट कर देखना पड़े तुम्हे मुझे फिर कभी!

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(PHOTOCREDIT:wallsonline.net)

 

 

 

11 विचार “यूँ ही !&rdquo पर;

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