सिकंदर !

लगता है कि थम सी गयी है जिंदगी
एक किनारे पर
घरौंदा जहाँ बना है इंसानो का
इस धरती पर!

कहाँ से आए हैं
किधर है जाना
एक चक्रव्युह सा है
यह सारा ज़माना !

बंजर से मन पर
हरे खेत खिल खिल्लाना
देखा है यहाँ
तारों का जमीन पर आना!

अजब सी इस दुनिया
के गज़ब से अफ्साने
बनाए यह किसने
खूबसूरत तराने !

एक स़फर पर यूँ ही हमें भेज कर
बैठा है वो आँखेंटी काये इस नज्म पर
गाये जो भी तरन्नुम में ,सही,
बन जायेगा वो इस जहाँ का सिकंदर !

Advertisements