वक़्त

वक़्त किसी के ठहरते न ठहरा
बंद मुट्ठी से जैसे रेत फ़िसले ज़रा
हम ख़ामोशी में यूँ अकेले रह गए
कहानियां बनती गयी हमारे चबूतरे पे!

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