गुलिस्तान

ना पनपने देना मन में ईर्ष्या

ना द्वेष किसी से करना

 इससे कुछ नहीं  है हासिल
बस एक दिन मिट्टी में है मिलना …

क्या जाने किस घड़ी
हो ऐसा इम्तिहान
दुनिया की हो हर चीज़ बगल में
रुखा  हो घर,संसार …

छोड़ गृणा  की छोटी बातें
खोल दे मन के द्वार अभी से
जिसमे सारा जहां समाये
बना ऐसा गुलिस्तान दिल से.

गुलिस्तान&rdquo पर एक विचार;

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