मैँ कौन हूँ

कभी लब्ज करे सवाल , कि मैँ कौन हूँ
जश्ने उल्फत कहे कि शराब हूँ
जिसे देख् कर ना,

कभी भी यह दिल भरे
जो लगा लूँ लब से तो
नशा ही हो !
तेरी जिंदगी का बस एक पल ही हूँ
तुझे इल्म हो , यह दुआ करूँ!

ऐ नौजवानों !

 

संभल कर रहना ऐ नौजवानों
कहीं अंधेरों में ना भटक जाना तुम
दूर् के नज़ारोन से
कहीं भ्रमित ना होना तुम .

होना तुम डटकर खड़े
अपने सच्चाई की लड़ाई में
हाथ थामना कमजोर का
चलना अपनी डगर पर होकर निर्भय …

संभलना इनसान के वेश में बैठे उस जल्लाद से
जिसकी नजरें हैं टिकी तुम्हारे शांत , कोमल मन के अज्ञान- पे
तुमसे ही है इस धरती का भविष्य
तुमसे ही है आस् सभी को
जो तुम भटक जाओ स़फर में
लानत है हमारे संस्कार पर !

खड़े हैं हाथ में लिए यह कमान
थामने तुम्हे गर्व से
संभलना ऐ नौजवानों
इस देश के धरोहर को सम्मान से

दबी साँस !

उस प्यार की डोरी को जलते देखा है
बंद कमरे में उसे झुलसते देखा है
सिसकियों से भरी रात में देखा है
दो बोल मोहब्बत के लिए तरसते देखा है
घुटन में दबी उस साँस को सुना है
जो जीना चाहे , खुली हवा में ,
उस मन की ख्वाइश
को यूँ ही रौंदते देखा है!

मुक्ति

किस मुक्ति की बात करे है तू
जब मन ही नहीं मुक्त संसार से
कहाँ जाए काशी , काबा
जब फँसा हो मन इस मायाजाल में …

मुक्त कभी नहीं ,तू हो सकता
अगर त्याग दिया यह वेश भी
वरना कोइ संत , सूफी ना कहता
जो है, बस यही सही …
घाट घाट का पानी पीया
फिर भी ना जाना यह बात अभी ?
मरने से मुक्ति नहीं मिलती, ऐ राहगीर .
जब तक ना बने ,उन्मुक्त,तू ही !

 

 

 

arzi

naa meine dekha raqeeb, naa jaana apna naseeb
bas is adne se dil ki khwaish , puri kar do ae mujeeb,
ban kar haqeem , le aao woh aisi dawa
ki gum ho jaaye, dil ke saare marz yaheen!

इंसान

किस भंवर में है उलझा यह संसार
चंद रोटी के टुकड़े और मकान
यही तो थी ज़रुरत उसकी
फिर क्यों बैल सा ढ़ो रहा है
यह भोझ इंसान
कांच के महल , अशर्फियों की खनक
मखमली बिछौने , यह चमक धमक
भूल गया वो अब मुस्कुराना
ना याद रहता उसे अब सांस भी लेना,
के गुम हो गयी अब उसकी शख्सियत
रह गया बस बनके एक मूरत
जाग कर भी ना आँखें खोलें
ऐसी हो गयी उसकी फितरत !

कश्मीर

वह पृष्ठभूमि ,है हमारी तक़दीर
सियासत की खुनी लड़ाई में
ज़िन्दगी की बन गयी भद्दी तस्वीर
गर बहा ले जाए झेलम की लहरें
इन नफरत के शोलों को
फिर से ऐ! फ़िरदौस
बन जाएगी जन्नत यह तुम्हारी ज़मीन!

मनुष्य

उस काव्य की  रचना ना हुइ कभी
जिसमें श्रेष्ठ, कभी,
कोई जाति हुई
ना रंगभेद के विचार लिखे कहीं
मनुष्य धर्म सर्वश्रेष्ठ
यही संतों की वाणी रही …

फिर क्यूँ आग से खेले मनुष्य
भूलकर अपने आचारविचार
बना दिया युद्धभूमि का आँगन
जिसपर बसता था इनसान …

आग

बुझती नहीं यह आग जो, जलती है बन के अंगार
दिल का चिलमन जैसे गाता हो मोहब्बत के पैग़ाम
बनके धुआँ जब रुख़सत हुए , हम इस महफिल से
रंग उनके सुरमे का बहने लगा क्यूँ ज़ार ज़ार “

कलयुग का अन्धकार

दिशाहीन है आज का समाज

बर्बरता का है भूचाल

इन भटकते राहों में

खो गया है एक इंसान।

लिए जन्म चौरासी हज़ार

सीखा न कुछ एक बार

रह गया बनकर एक भक्षक

करता रहा नरसंहार

अंधेर बना कर दुनिया को
उजाड़ दिया सबका संसार
कहीं भूक, बेरोज़गारी से
कभी राह में अत्याचारी से
किसी रात के दबे हज़ारों ज़ख़्म
कुरेद दिए तूने अपने
अश्लीलता की कटारी से।

नित नए पुराने हथकंडे
तूने अपनाये कपट सहारे से
भूल गया तू इस जीवन का
मक़सद, इस बाजार में ,
बेच दिए तूने सारे बंधन
किया नग्न मानव जात को

शर्मसार हुआ है इश्वर
तेरे इस अज्ञान कुकर्म  से
जाने कैसी घडी अब आये
यह कलयुग का अन्धकार है!