बहाना

हमगुजरते दौर के साये में खड़े थे
कभी अपना वजूद
कभी आइना
झूठ निकाला  !

कब्र तक जाते ना जाने कितने
ऐब जानेंगे हम ,
ख़ुद को जाना तो
तो जाना सब धोखा है !

बस यूँ ही रहतीं है
इक नज्म होंठों पे लेकिन
तुमसे मिलना …
यही जीने का बहाना  है

कैसी हवा ?

किस मिट्‍टी के हम बने
कैसी हवा चल रही है आजकल
इनसान होना भूल  गए
पल पल झलकता है
इस दुनिया में
किसी की  हैवानियत का बल…

उस पेड़ से लटका हुआ वह सावन का झूला
आज दिखता है, वहाँ किसी की हँसी का फन्दा
चुल्बुल सी , जो उछलती  थी
उसका नन्हा बचपन सिमटा ….

क्या बात हुई, ना जाने क्यूँ
दिखता नहीं अभी यहाँ सवेरा
बस सूरज मानो ढल गया
गुमनाम अन्धेरे में ना जाने कहाँ…

आजकल ना जाने कौन सी
हवा चली है यहाँ
इनसान भूल गया
बनना इनसान.

यादों के झरोखे

यादों के झरोखे में
सिमटकर हम ले चले
चंद किस्से प्यार भरे
एक सुनेहरा दिन,
कुछ
चाँदनी रातें
वह गीली रेत में
चलना …तारे  गिन गिन…

किस पल आए फिर ऐसा समा
लहरों में छुपा लूँ अपना जहाँ
चंद मामूली बातें
कुछ अनकहे किस्से …

मुद्दत से राह् देखे यह मन
कब फिर शुरु होगा
मिलों पुराना यह स़फर

अधूरा जो रह गया था
किसी मोड़ पर
आओ चले फिर से
उसी यादों के झरोके पर …

@SoumyaV

 

ऐ मन , तू है चिरायु!

घने बादलों के साये मँडराते है आज
चहुं ओर छाया है अन्धेरा
ना कोइ रौशनी , ना कोई आस्
फिर भी चला है यह मन अकेला.

ना डरे यह काले साये से
ना छुपा सके इसे कोहरा
अपनी ही लौ से रोशन करे यह दुनिया
चले अपनी डगर…
हो अडिग, फिर भी अकेला …

ना झुकता है यह मन किसी तूफान में
ना टूटे होंसला इसका कभी कही से
एक तिनके को भी अपनी उम्मीद बना ले…
ऐसा है विश्वास बांवरे मन का…

ना थके वो , ना रुके वो
मंज़िल है दूर् , दूर् है सवेरा
चला जाए ऐसे, पथ पर निरंतर
ऐ मन , तू है चिरायु …

अभी बाकी है

ढलता है दिन सुर्ख आसमान में

वह घना अँधेरा डूब गया अब रात के स्याही में

इस कलम की बात अभी अधूरी है

कुछ पैगाम अभी लिखना ज़रूरी है

जलती शमा ने बाँध लिया वह समां

 पर दिल की कलम से वह बात लिखनी अभी  बाकी है.

आग़ाज़ हो चला एक नए सफर का
उस नए मौसम की हवा सुहानी है
फिर भी यह  मन यूँ ही खड़ा मझधार
उसके मोहब्बत की किस्मत लिखनी अभी बाकी है

खामोशी

एक ज़ुबान हम जानते हैं
खामोशी है जिसका नाम
नजरें करे गुस्ताखिया
चाँद फिर भी दिखे अनजान
छुपकर बादलों में पलक झपकाये बार बार
कभी ओस की बूँदों में छलके
कभी बारिश की बूँदों में दिखाये अपना प्यार

उम्र

अल्फाज की गहराई,
नहीं मोहताज
उम्र के दस्तावेज पर
लब्ज करते है बयान ये 
वो दर्द और किस्से
जो उतरे हैं खंजर से
रूह की गहराई में !

मैँ कौन हूँ

कभी लब्ज करे सवाल , कि मैँ कौन हूँ
जश्ने उल्फत कहे कि शराब हूँ
जिसे देख् कर ना,

कभी भी यह दिल भरे
जो लगा लूँ लब से तो
नशा ही हो !
तेरी जिंदगी का बस एक पल ही हूँ
तुझे इल्म हो , यह दुआ करूँ!

ऐ नौजवानों !

 

संभल कर रहना ऐ नौजवानों
कहीं अंधेरों में ना भटक जाना तुम
दूर् के नज़ारोन से
कहीं भ्रमित ना होना तुम .

होना तुम डटकर खड़े
अपने सच्चाई की लड़ाई में
हाथ थामना कमजोर का
चलना अपनी डगर पर होकर निर्भय …

संभलना इनसान के वेश में बैठे उस जल्लाद से
जिसकी नजरें हैं टिकी तुम्हारे शांत , कोमल मन के अज्ञान- पे
तुमसे ही है इस धरती का भविष्य
तुमसे ही है आस् सभी को
जो तुम भटक जाओ स़फर में
लानत है हमारे संस्कार पर !

खड़े हैं हाथ में लिए यह कमान
थामने तुम्हे गर्व से
संभलना ऐ नौजवानों
इस देश के धरोहर को सम्मान से

दबी साँस !

उस प्यार की डोरी को जलते देखा है
बंद कमरे में उसे झुलसते देखा है
सिसकियों से भरी रात में देखा है
दो बोल मोहब्बत के लिए तरसते देखा है
घुटन में दबी उस साँस को सुना है
जो जीना चाहे , खुली हवा में ,
उस मन की ख्वाइश
को यूँ ही रौंदते देखा है!