“जोगी दे नाल “- एक नया सुरीला सफर

आज आप सभी को  एक खुशखबरी देनी है . मेरी नई कंपनी औदुम्बर आर्ट्स का पहला गाना आज Zee म्यूजिक के YOUTUBE Channel पर release  हुआ.
कृपया इसे देखे और पसंद हो तो शेयर करे .

पंजाबी में लिखा हुआ “जोगी दे नाल ” यह एक सूफी गाना है  , जिसकी धुन आधुनिक संगीत की तर्ज़ पर बनायीं गयी है।

सूफी संगीत ने अरसों से अलग अलग भाव एवं अंदाज़ देखे और अपनाए है। रॉक हो या पॉप,फ्यूज़न हो या फिर क़व्वाली ,इसको जिस अंदाज़ में पेश किया , सूफी गीतों ने अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है।

यह गीत बॉलीवुड के गीतकार अलोक रंजन झा ने अपनी जादुई कलम से लिखा है , जिनकी हाल ही मैं फिल्म “शोरगुल” में भी गीत “बारूदी हवा ” काफी मशहूर हुआ। यह अभी “जय भीम ” गाने के लिए भी पुरस्कृत हुए हैं।

गाने की धुन विवियन वैद्य ने बनायीं है ,जो कई सालों तक देश की नौसेना के लिए काम कर चुके हैं। इन्हे आठ वाद्यों में महारथ हासिल है और इनका अपना रॉक बैंड “फ्यूज़न ट्रिक्स”गोवा में काफी प्रसिद्ध है।

जोगी दे नाल में आवाज़ कौशिक कश्यप की है, जो की असमिया फिल्मों में गान गए चुके है और काफी शोज भी कर चुके हैं। यह अभी तक अली खली मिर्ज़ा  जो की बिग बॉस के प्रतिभागी रह चुके हैं, उनके साथ काम करते थे।

जोगी दे नाल का गीत विशेष रूप से युवा वर्ग को मन्दे नज़र रखते हुए किया गया है।इस गीत में कई वाद्यों का प्रयोग किया है ,  इस की ताल और तर्ज़ आधुनिक संगीत  पर  आधारित है और इसमें उपयोग हुए गिटार एवं सैक्सोफोन में  डेविड सिंचुरी और आय डी राव ने अपना कमाल दिखाया है, जो की ऍम टी वी इंडीज और ऍम टी वी कोक स्टूडियो में प्लेयर्स है।

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एक ख्वाब है

एक ख्वाब है :
एक पल का
जब साथ हो आपका
किसी ठंड सी  ठिठुरती रात में
बातों का फलसफा लिए
कुछ हम कहे
कुछ आप कहे
चाँद जब दिखे आसमान में…
एक पल जिये
क्या कभी यह दिन आएगा
क्या  मन एक पल  जी पायेगा
वक्त के तरकश  से
क्या कभी यह तीर निकाल पायेगा?

मौसम की इस अदला बदली में

यूँ तो: हमने कभी  सोचा  नहीं
कि इस क़दर आप बसते हैं ज़हन में
पल  भर की खामोशी भी ना अब
सहती इस मौसम में…

मौसम की इस अदला बदली में
कई रंग फिज़ा ने  बदल दिए
कुछ पुराने पत्तों से झड़ गए
कुछ नए फूलों की  खुश्बू से खिल गए…

देखे अब क्या है
इस मौसम की ख्वाइश
कोई
मुस्कुराहट या फिर कोई नई नुमाइश
जिंदगी के मौसम कितने अजीब
कभी मौसम-ए – हिज्र
कभी मौसम – ए- दीद !

उड़ान

उस किवाड़ के खुलते ही मानो
जिंदगी बेगैरत  हो गयी
तिजोरी में बंद थी अबतलक
अब खुली किताब बन गयी

अक‍सर चार दीवारों
में कैद इनसान रेह्ते हैं
परिंदों कि माने
तो ख्वाइशें अब बेहिसाब हो गयी

उस नीले आसमान ओ देख्
अब मन बेकाबू हो चला
ऊँची उड़ान कि
अब फितरत हो गयी

किस बात से हूँ में यूँ खफा
ख़ुद से नाराज ,आपने आप से ज़ुदा
नजर कहीं ,दिल कहीं ,
हाल ए बयान ना समझे कोई
वक्त का कतरा भी बह गया
उनकी आवाज़ की खनक
दिल में चुभ सी गयी
आज इन वादियों में
ढूँढे मेरा मन यही
मुझसे घड़ी भर मिल ले
ऐ मेरे हमनवा ,यूँ ही

चित्त की सुनो

) चित्त की  सुनो रे मनवा
चित्त की  सुनो
बाहर घोर अंध्काल
संभल कर चलो …

राह् कई है, अनजानी सी
देख् पग धरो, रे मनवा
चित्त की  सुनो…

अज्ञान- के कारे बादल
गरजे बरसें बिन कोई मौसम
आपने मन की  लौ को जगा कर
रखना तू हर पल
रे मनवा ,चित्त की  सुनो…

ऐसे चित्त का चित्त रमाये ध्यान करे  हरि का
भव्सागर पार हो जाए
कलयुग में
जगा कर रोम रोम और प्राण
रे मनवा ,

चित्त की सुनो हर बार

कैफियत

अब किससे करे गिला, किस से करे शिकायत
गैरों ने माना अपना, अपनों ने की नफ़रत…
अब ना कोई उम्मीद, ना कोई मोहब्बत
जज़्बात ए इश्क में, हम बन गए, एक कैफियत