ओ ! चंद्रिका !

ओ ! चंद्रिका ! तेरे माथे की बिन्दिया है वो चाँद
नयनो में बने कजरा ,
निशा का यह घोर अन्धेरा
तेरे होठों की रंगत लाये
वह सुबह की लालिमा
चितचोर सा छुपा वो चाँद
घने कारे बादलों में सिमटा ,
जैसे ज़ुल्फों से निहारता
एक गुलाब !

ओ चंद्रिका! तड़पे मन हर पल
जागु मैँ सारी रात
तेरी शीतल छाया
जलाये मेरा मनवा
रोम रोम में अंगार….

चंद्रिका ! तुझसे ना करूँ में बात
आह भरे, मेरे हृदय की साँसें
तेरा सांवरा तो है तेरे पास,
किस से कहूँ मैँ अपने
पिया की है मुझे अब
आस ,
चंद्रिका , तेरा चाँद तो है तेरे पास.

Copyright@Soumyav2015

Kanha!

शीश पर मोरमुकुट सजे,
होंठों पर बांसुरी सुरीली,
वृन्दावन के कुञ्ज गली में,
घर घर देखि मोहन की छवि!
चहुँ और है एक उजियारा,
हरी के नाम से गया अँधियारा,
नेत्रहीन सूरदास गाये,
गीत कान्हा के उपमाओं का।
क्या कहें मीरा की तान,
राधा भी झूमे मुरली में ध्यान,
प्रकृति के कण कण में बसा
वही एक कान्हा का नाम।
में तो देखू छाया उनकी ..
प्रत्येक जीव के रोम रोम में,
कान्हा तेरे दरस के लिए।।
वन वन घूमे बावरे.
कह दे तू कहाँ है छुपा
किस मन मंदिर में बसाए
अपना स्थान
इस क्षण में कहाँ है रमा।
किस कण में है तेरे प्राण!