दर्शन

मृग तृष्णा की भाँती कहाँ भटके है तू  वन वन,
जिसके लिए तरस जाए आँखें,
वो मिलेंगे तुझे अपने अंतर मन,
ह्रदय कमल के पुष्प कुञ्ज में,
विराजे वो जैसे ब्रह्मकमल !
 
 
ध्यान,तप , हवन ,कर  भी ,
जब न हो उनके दर्शन ,
तब खोल किवाड़  अपने मन के,
झांक ले  तनिक तू भीतर !
 
 
अपने बिगड़े कामो को जब,
मिले न कोई राह निरंतर ,
तब तूने है याद किया उसे ,
जो राह तक रहा था तेरी …
लिए प्रेम की धारा अविरल !
 
 
आज दिनों के बाद याद करे जिसे,
वो बैठा है धुनी रमाये इधर,
बाँट देखे उस भक्ति सुधा  की,
जो बहने को हो तैयार इस डगर !
 
 
मन की आँखें   खोल के ज़रा ,
तू ध्यान कर उसका अगर,
खिल जाएगा पुष्प ह्रदय का,
और  दर्शन देंगे परम हंस .

Kanha!

शीश पर मोरमुकुट सजे,
होंठों पर बांसुरी सुरीली,
वृन्दावन के कुञ्ज गली में,
घर घर देखि मोहन की छवि!
चहुँ और है एक उजियारा,
हरी के नाम से गया अँधियारा,
नेत्रहीन सूरदास गाये,
गीत कान्हा के उपमाओं का।
क्या कहें मीरा की तान,
राधा भी झूमे मुरली में ध्यान,
प्रकृति के कण कण में बसा
वही एक कान्हा का नाम।
में तो देखू छाया उनकी ..
प्रत्येक जीव के रोम रोम में,
कान्हा तेरे दरस के लिए।।
वन वन घूमे बावरे.
कह दे तू कहाँ है छुपा
किस मन मंदिर में बसाए
अपना स्थान
इस क्षण में कहाँ है रमा।
किस कण में है तेरे प्राण!