ओ ! चंद्रिका !

ओ ! चंद्रिका ! तेरे माथे की बिन्दिया है वो चाँद
नयनो में बने कजरा ,
निशा का यह घोर अन्धेरा
तेरे होठों की रंगत लाये
वह सुबह की लालिमा
चितचोर सा छुपा वो चाँद
घने कारे बादलों में सिमटा ,
जैसे ज़ुल्फों से निहारता
एक गुलाब !

ओ चंद्रिका! तड़पे मन हर पल
जागु मैँ सारी रात
तेरी शीतल छाया
जलाये मेरा मनवा
रोम रोम में अंगार….

चंद्रिका ! तुझसे ना करूँ में बात
आह भरे, मेरे हृदय की साँसें
तेरा सांवरा तो है तेरे पास,
किस से कहूँ मैँ अपने
पिया की है मुझे अब
आस ,
चंद्रिका , तेरा चाँद तो है तेरे पास.

Copyright@Soumyav2015

चाँद !

ढलते हुए सूरज ने कहा,
ऐ ! चाँद आ अब तू कर रोशन यह जहाँ ,
बिखेर कर अपनी चांदनी यहाँ,
बाँध ले यूँ अपना समां !
 
यह रात है  चार पहर की,
जला के अंधियारों  में दिए,
तू बन जा इस जहाँ का
सब से प्यारा मितवा!
 
फिर सुबह की किरणों से,
यह खो जाएगा आसमान,
जहां चाँद होता है ज़मीन पर ,
तारे जगमगाते  आसमान !