दर्शन

मृग तृष्णा की भाँती कहाँ भटके है तू  वन वन,
जिसके लिए तरस जाए आँखें,
वो मिलेंगे तुझे अपने अंतर मन,
ह्रदय कमल के पुष्प कुञ्ज में,
विराजे वो जैसे ब्रह्मकमल !
 
 
ध्यान,तप , हवन ,कर  भी ,
जब न हो उनके दर्शन ,
तब खोल किवाड़  अपने मन के,
झांक ले  तनिक तू भीतर !
 
 
अपने बिगड़े कामो को जब,
मिले न कोई राह निरंतर ,
तब तूने है याद किया उसे ,
जो राह तक रहा था तेरी …
लिए प्रेम की धारा अविरल !
 
 
आज दिनों के बाद याद करे जिसे,
वो बैठा है धुनी रमाये इधर,
बाँट देखे उस भक्ति सुधा  की,
जो बहने को हो तैयार इस डगर !
 
 
मन की आँखें   खोल के ज़रा ,
तू ध्यान कर उसका अगर,
खिल जाएगा पुष्प ह्रदय का,
और  दर्शन देंगे परम हंस .