महल प्यार का

चिराग दिल के जला के हम
राह् तके चारों पहर
फिर एक लम्हा बीत गया
एक ज़माना गुजर गया …

हम यूँ ही शमा जलाते रहे
दामन यूँ ही जलता गया…

तुम्हे वक्त का ना कभी तकाजा हुआ
ना तुमने खोजे वो पल यहाँ
कि रेशम से अश्कों में बह गया
आलीशान यह महल प्यार का !!!

दिल


चाह  कर भी न कह सके जो बात रह गयी दिल में छुपी ,
कभी हलकी सी रौशनी में  सोचु  ,वो बाहर न आये कहीं,
चेहरे पे बयां कर दे तो …किस कदर समझाऊ मै उनको ,
की नहीं समझता है ये  दिल हमारी उलझन को!

अपने ही में रहता वो,
न देखे ज़माने की रुसवाई को,
छ लका  देता कुछ बूँदें ये अपने बेबसी की,
गर न दिखे  इसे कोई उम्मीद प्यार पाने की !

हम तो समझ जायेंगे ,
तुम्हारे अफ़साने को,
इस दिल को कौन बताए ,
की मिटा दे वो अपने अरमानो को !

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