एक चाँद था ज़मीन पर

फ़लक पर जो चाँद था ,
देख् रहा था नजरें टिकाये जमीन पर
कभी बादलो के पीछे से, कभी तारों के बीच से
वो पूर्णिमा की  रात थी ,
एक चाँद आसमान पर था
एक नीचे बगीचे में ठिठुर रहा था


भूका, प्यासा तिलमिलाता
बेज़ुबान सा
अनदेखा कर गया , एक काफिला कुछ ही कदमो की  दूरी पर
जग्मगाता , टिम्टिमाता
मानो धरती पर हो रहा हो कोई
तारों का मजुम
सुगंधित फूलों के बीच
स्वादिष्ट पकवान
अर्पण हो रहे थे जो
उस आसमान के चाँद के लिए
एक चाँद था ज़मीन

पर
बस निहारता हुआ

@SoumyaV

MAN MEIN BASANT

अम्बुआ की डाली पर
बैठी कोयल गा रही मल्हार ,
सुना रही हमे गीत लिए प्यार की पुकार ,
चहू और है बसंत का मौसम मनमोहक
है सारा जहां …
दखे इसे मन नाच उठा जैसे,
पायल की झंकार …
सुगंध फैली है जैसे की कस्तूरी मृग
का सुवास,
दूँ ढ रहा जैसे वन उपवन में
लिए अपने भीतर
ही जिसका वास …
रंग बिरंगे फूलों से सजा है ,
यह सारा निरIंकार ,
मानो धरती कर रही हो जैसे
कोई अमृत संचार …