आओ चांदनी तुम्हे चुरा लूँ

“आओ चांदनी तुम्हे चुरा लूँ
उस चाँद से,
जो पढ़ता है कसीदे रात के अँधेरे में
अपनी मोहब्बत के
गुलाब की उन बंद पंखुरियों से
वह भीनी खुशबु को उड़ा लूँ
हवा के झोंके संग
लहरा कर तुम्हारे नीले दुपट्टे को
नदी तालाब सा बहा लूँ
संग पंछी उड़ जाऊं ऊँचे पर्वत पर
और फ़िज़ा में तुम्हे
घोल दूँ इत्र बन “

कहता है आज बरामदे
पर खड़ा उगता सूरज
भीनी भीनी रौशनी में
मुस्कुराता सूरज

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एक ख्वाब है

एक ख्वाब है :
एक पल का
जब साथ हो आपका
किसी ठंड सी  ठिठुरती रात में
बातों का फलसफा लिए
कुछ हम कहे
कुछ आप कहे
चाँद जब दिखे आसमान में…
एक पल जिये
क्या कभी यह दिन आएगा
क्या  मन एक पल  जी पायेगा
वक्त के तरकश  से
क्या कभी यह तीर निकाल पायेगा?

अपने अपने हिस्से का आसमान

वो नीला आसमान ,
कुछ तेरा , कुछ मेरा
बाँट लिया आपस में
हमने अपने हिस्से का आसमान
कई रंग के ख्वाब यहाँ …
जीने के हजारों मक़ाम…

तेरी जेब में दुनिया को खरीदने का सारा सामान
मैंने भी जोड़े चंद सिक्के ,
अपनाने कुछ ऐश ओ आराम ..

पर वो शक़्स रहता जो
खुले आसमान के तले
ना जुटा पाया कुछ सामान
ना पहचाने दुनिया उसे ,
ना अपनाये अपनों में कहाँ

छीन गयी जिसकी
एक बिघा ज़मीन
ढोये वो बोझ, गैरों का यहाँ …
वो राह् पर भूकाबैठा …
तू चटकारे लगाये यहाँ …

क्या खूब जिया तू इनसान
कैसा यह फ़ासला …
इनसान …तू
इनसान से जुदा यहाँ !

उस अनपढ़ , के हाथों
ना दी किसी ने एक
कलम और किताब
छीन लिया बचपन
थमा दी लाठी
दूर् कर
भेद कर
अलग कर
इनसान को ,
इनसान से यहाँ…
बस
बाँट लिया आपस में हमने
अपने अपने हिस्से का आसमान !

कैसी हवा ?

किस मिट्‍टी के हम बने
कैसी हवा चल रही है आजकल
इनसान होना भूल  गए
पल पल झलकता है
इस दुनिया में
किसी की  हैवानियत का बल…

उस पेड़ से लटका हुआ वह सावन का झूला
आज दिखता है, वहाँ किसी की हँसी का फन्दा
चुल्बुल सी , जो उछलती  थी
उसका नन्हा बचपन सिमटा ….

क्या बात हुई, ना जाने क्यूँ
दिखता नहीं अभी यहाँ सवेरा
बस सूरज मानो ढल गया
गुमनाम अन्धेरे में ना जाने कहाँ…

आजकल ना जाने कौन सी
हवा चली है यहाँ
इनसान भूल गया
बनना इनसान.

मैँ कौन हूँ

कभी लब्ज करे सवाल , कि मैँ कौन हूँ
जश्ने उल्फत कहे कि शराब हूँ
जिसे देख् कर ना,

कभी भी यह दिल भरे
जो लगा लूँ लब से तो
नशा ही हो !
तेरी जिंदगी का बस एक पल ही हूँ
तुझे इल्म हो , यह दुआ करूँ!

गुलिस्तान

ना पनपने देना मन में ईर्ष्या

ना द्वेष किसी से करना

 इससे कुछ नहीं  है हासिल
बस एक दिन मिट्टी में है मिलना …

क्या जाने किस घड़ी
हो ऐसा इम्तिहान
दुनिया की हो हर चीज़ बगल में
रुखा  हो घर,संसार …

छोड़ गृणा  की छोटी बातें
खोल दे मन के द्वार अभी से
जिसमे सारा जहां समाये
बना ऐसा गुलिस्तान दिल से.

पंख

पंख लगा के आसमान में उड जाऊँ
चाहे यह मन चकोर
देख् नील गगन का उजियारा
नाचे जैसे वन में चंचल मोर!

कहे है बावरा उसे ,
फिरभी ना समझे यह मन
उड़ते बादलों से बंध जाए
रह रह कर यह दिल कि डोर !

आ जाएँ कहीं बनाये बसेरा
जब होगी शाम चहुं ओर
थम जाए कुछ पल के लिए,
जब तक ना समझे यह पागल मन चितचोर!