कलयुग का अन्धकार

दिशाहीन है आज का समाज

बर्बरता का है भूचाल

इन भटकते राहों में

खो गया है एक इंसान।

लिए जन्म चौरासी हज़ार

सीखा न कुछ एक बार

रह गया बनकर एक भक्षक

करता रहा नरसंहार

अंधेर बना कर दुनिया को
उजाड़ दिया सबका संसार
कहीं भूक, बेरोज़गारी से
कभी राह में अत्याचारी से
किसी रात के दबे हज़ारों ज़ख़्म
कुरेद दिए तूने अपने
अश्लीलता की कटारी से।

नित नए पुराने हथकंडे
तूने अपनाये कपट सहारे से
भूल गया तू इस जीवन का
मक़सद, इस बाजार में ,
बेच दिए तूने सारे बंधन
किया नग्न मानव जात को

शर्मसार हुआ है इश्वर
तेरे इस अज्ञान कुकर्म  से
जाने कैसी घडी अब आये
यह कलयुग का अन्धकार है!

गुलिस्तान

ना पनपने देना मन में ईर्ष्या

ना द्वेष किसी से करना

 इससे कुछ नहीं  है हासिल
बस एक दिन मिट्टी में है मिलना …

क्या जाने किस घड़ी
हो ऐसा इम्तिहान
दुनिया की हो हर चीज़ बगल में
रुखा  हो घर,संसार …

छोड़ गृणा  की छोटी बातें
खोल दे मन के द्वार अभी से
जिसमे सारा जहां समाये
बना ऐसा गुलिस्तान दिल से.

इस धरती

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मुद्दत से अक्सर राह देखती है आँखें
उस सुनहरे भविष्य पर
जब इस धरती के फूल खिलेंगे
चारो ओर अम्बर पर। ।

जब ना होगा कोई भ्रष्टाचार
ना कोई किसी का गला काट
ना रास्तों पर चलने को
डरेंगी बहनें हज़ार।

जब हर एक कोने से गूंजेगी
एक वाणी ,एक ही आवाज़
ना भेद करेंगे लोग यहाँ के
रंग ,जाती व  धर्म का घिनौना व्यापार।

ऐसे सुन्दर सजग स्वप्न में
मैं  जियूं हज़ारों साल
हर एक जन्म यही हो मेरा
इस धरती पर जहाँ होगा
एक राज्य का स्वर्णिम काल!

कन्हैया

गोकुल में भयो बाल काल
ग्वाल बाल बने सखा
बांसुरी की धुन में
झूमे नन्द संग गोपियाँ

वृन्दावन की कुञ्ज गली में
राधा करे श्रृंगार
अपने आराध्य के रंग में
रंग  लियो अपना संसार

द्वारिका जो गए कन्हैया
मुड़ के देखो न एक बार
राधा ,संग गोपियों
पलके बिछाये हैं
यमुना पार!

सुनाके कान्हा एक धुन अनोखी
करदो सबके मन को शांत
झूमने लगे फिर से अम्बर
ऐसे राग को छेडो आज!

photocredit:www.hdwallpaperss.com

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वो लम्हे प्यार के!

  अर्जी दी थी हमने भी मगर,ना उसपर कोई करवाई  हुई ,
बैठे रहे तेरे कुचे में आकर ,उम्र यूँ गुजरती गयी,
देखते ही देखते आँखों के चंद लब्ज़ …
बसा गए सपनों का जहां,
मगर हकीकत बनने से पहले
वो चंद लब्ज़ , इतिहास में समा गए।

राह पर तेरी हम फूल बीछा गए,
इत्र के बदले अपने प्यार की कुछ बूँदें छलका गए,
इस उम्मीद में , की,
जब कभी गुजरे तुम्हारी हस्ती
इस राह से,
याद दिला  दे तम्हारे दिल को …
वो लम्हे प्यार के!

ये  हवा की नमी ,चंद बारिश की बूँदें,
गवाह रहे इस तरन्नुम के,
की ज़िन्दगी निकाल  दी  यूँ,
हमने तेरे दर पे,
जाते जाते
सजा गए  गुलशन को तेरे ,
हम  अपने रंग से!
हो सके महसूस कर लेना
वो लम्हे प्यार के!

(photo:shaansepoetry.ucoz.com)

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दिल


चाह  कर भी न कह सके जो बात रह गयी दिल में छुपी ,
कभी हलकी सी रौशनी में  सोचु  ,वो बाहर न आये कहीं,
चेहरे पे बयां कर दे तो …किस कदर समझाऊ मै उनको ,
की नहीं समझता है ये  दिल हमारी उलझन को!

अपने ही में रहता वो,
न देखे ज़माने की रुसवाई को,
छ लका  देता कुछ बूँदें ये अपने बेबसी की,
गर न दिखे  इसे कोई उम्मीद प्यार पाने की !

हम तो समझ जायेंगे ,
तुम्हारे अफ़साने को,
इस दिल को कौन बताए ,
की मिटा दे वो अपने अरमानो को !

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सभ्यता का ढोंग !

 

किसी भी देश की उन्नति वहां बसे लोगों की आर्थिक , सामाजिक एवं मानसिक स्थिति से प्रभावित होती है।
पश्चिम के देश अपनी सुदृद आर्थिक व्यवस्था के लिए मशहूर एवं परिपूर्ण है किन्तु वहां भी लोगों की मानसिक अवस्था कुछ उलझनों में सिमटी हुई है . और ऐसे स्थिति में वहां के समाज में हमे कई प्रकार के विशाक्त्पूर्ण एवं अमानवीय घटनाएँ देखने को मिलती है।
भारत प्राचीनकाल से अपने संस्कारों के कारण चर्चा में रहा है।
पश्चिम देशो का समाज हमारे यहाँ ही कारणों को ढूढ़ ता आया है हमारे इतने विषम परिस्थितियों में भी न हार मानने का गुण और कठिन समय पर भी खुश होने का एहसास।
किन्तु आज के दौर मे अपने देश हो रहे अमानवीय आचरण से देश ही नहीं वरन संपूर्ण मानव जाती शर्मसार है .
इस प्रकार के विभत्स विचार और ऐसी हरकत ने हमारे शीश को ग्लानी से झुक दिया है!
समय रहते अगर हमारे प्रणाली में कुछ सुधार हो जाए ,लोगों की मानसिक सोच को अगर नयी दिशा मिले तो इस देश की उन्नति की बातें करने में कोई अर्थ है,वर्ना,प्रगति सिर्फ नाम मात्र की रह जायेगी .
ना चाहते हुए इस देश के वो लोग जो अपनी आवाज़ एक कर के कुछ करना चाहते है यूँ ही वातावरण में मिल जायेंगे।
अर्थशास्त्र , राजनीती सब धरे धरे रहेंगे अगर मनुष्यता अपना अस्तित्व खो देगी।
इस मनुष्यता की परिभाषा जो हमने सारे विश्व को सिखाई है,यहाँ की आध्यात्मिकता जिससे सारा विश्व प्रभावित है, उसी भूमि के लोगों के अगर ऐसे भयानक विचार राज करते हैं, अगर यहाँ के लोगो की विचारधारा इतनी तुच्छ एवं संकीर्ण है ,तो ईश्वर को भी अपने इश्वरत्व पर शर्मसार होना पड़ेगा!

 

जज्बा

ना रोकना इस जज्बे को जो निकला है अपना रूतबा लिए,
आत्मसम्मान के इस लडाई में रख अपने शीश उठाये हुए,
कभी कभी ही ऐसे जोश में रहता है इंसान यहाँ,
बुझने न देना इस आग को जबतक न हो इन्साफ यहाँ .
 
 
बदल के रखेंगे हम हवाओं की दिशा जो हमसे टकराएगी,
देश के लिए मरना जाने तो क्या अपना हक न मांग पाएंगी ,
जागो सोये हुए लोगों ,घर तुम्हारा भी जल जाएगा ,
अगर न मोड़ा इस आंधी को तो सर्वस्व ही मिट जाएगा।
 
 
आँखें खोलो ,मन से सोचो ,क्या ऐसी दुनिया हम चाहेंगे,
मनुष्य जहाँ बना जानवर ,जंगल राज में खुला हुआ, 
शर्म गृना से झुक  गया सर   … ऐसा काम न अब हो,
वर्ना महाभारत भी यहीं हुआ था  … भूलना मत ये दोस्तों।