कलयुग का अन्धकार

दिशाहीन है आज का समाज

बर्बरता का है भूचाल

इन भटकते राहों में

खो गया है एक इंसान।

लिए जन्म चौरासी हज़ार

सीखा न कुछ एक बार

रह गया बनकर एक भक्षक

करता रहा नरसंहार

अंधेर बना कर दुनिया को
उजाड़ दिया सबका संसार
कहीं भूक, बेरोज़गारी से
कभी राह में अत्याचारी से
किसी रात के दबे हज़ारों ज़ख़्म
कुरेद दिए तूने अपने
अश्लीलता की कटारी से।

नित नए पुराने हथकंडे
तूने अपनाये कपट सहारे से
भूल गया तू इस जीवन का
मक़सद, इस बाजार में ,
बेच दिए तूने सारे बंधन
किया नग्न मानव जात को

शर्मसार हुआ है इश्वर
तेरे इस अज्ञान कुकर्म  से
जाने कैसी घडी अब आये
यह कलयुग का अन्धकार है!

ज़ुबान

जब एक झलक दिखी उस चाँद की
तो: दिल में एक  टीस उठी,
जागे हुए अरमान मचल  गए
सोयी सी  तक़दीर जाग उठी!

बंद करके पंखुरियों को
जब हम ने बना ली अपनी ज़ुबान
तरन्नुम प्यार के गाने लगे
यह धरती और आसमान!

 

पंख

पंख लगा के आसमान में उड जाऊँ
चाहे यह मन चकोर
देख् नील गगन का उजियारा
नाचे जैसे वन में चंचल मोर!

कहे है बावरा उसे ,
फिरभी ना समझे यह मन
उड़ते बादलों से बंध जाए
रह रह कर यह दिल कि डोर !

आ जाएँ कहीं बनाये बसेरा
जब होगी शाम चहुं ओर
थम जाए कुछ पल के लिए,
जब तक ना समझे यह पागल मन चितचोर!

कश्मकश

कभी पलकों पे रह गयी
नींद ठहरी सी इंतज़ार  मेँ
ख्वाबों के
कभी चुपके से आ  गयी
तुम्हे भी आपने आहोश मेँ लिए…

हम भूल गए अपना
वजूद इस कश्मकश मेँ
कि कहीं उड ना जाए
नींद …
तुम्हे अपने साथ लिए!

रहमत !

फिक्र नहीं हमें तूफानों की,
मझधार में जो हम रुक भी गए,
हम पर अगर है रहमत उसकी ,
तो तूफानों से क्यूँ हम डरे...


झुकाकर यह शीश हम ना 
करेंगे उसे शर्मिंदा 
सिखाया है जिसने 
तूफानों में भी जीना...

विश्वास की  ज्वाला को चिंगारी दे
हम चल पड़ेंगे अपनी डगर,
रुख मोड़ लेगी हवाओं का
साहिल बन कर अपनी किस्मत ! 

 

भाषा

भिन्नता में हम है जिते  जैसे रंग कई  गुलाल के
फिर भी दिल को जोड़े रखे यह हिंदुस्तानी भाषा हमारी,
घूम आए दुनिया के कोने ,
ना देखि ऐसी मधुर वाणी,
जिसमें बयान कर सके
हम अपने अस्तित्व के अस्मिता की कहानी ! 
जहाँ देवताओं कि बोली समझे 
पशु पक्षी और यह पर्वत
उस देश कि भाषा है निरालि 
कहते यह धरती और अंबर!!!

 

श्रद्धा

अगर लगे अंधकारमय है पथ जीवन का,
दूर तक ना हो रोशनी का कोई निशान ,
डर ना नहीं बस चलते रहना ऐ ! इंसान
एक किरण  भी ले जायेगी तुम्हे तारों के पार।

मन में रख तू विश्वास बनाये
गिर कर भी तू संभलना जाने
फिर काहे का डर सताए
इस पथ तो है वीरों के साए ..

सच्चाई की इस डगर पर
लाखों ने  अपने शीश झुकाए,
अपने मंजिल की ओर बढा  कर कदम
चलते जा तू यूँ ही निरंतर …
दिखेगा लक्ष्य तुझे
अगर रहे नज़र
अटल निश्चल !

अनदेखी सी शक्ति होगी ,तेरे  हर कदम  के तले ,
जो उठा लेगी हाथों में ,अगर कहीं कांटे मिले,
रख कर यह श्रद्धा का दीपक, हाथ में तू चला अगर ,
दूर नहीं कोई भी मंजिल, पहुंचेगा तू , सितारों के परे …

उद्धरण

स्याही

कुछ अल्फाज़ दिल की स्याही से लिखे गए,
कुछ अपने साथ फूलों की खुशबु समा लिए,,
बिखरते वक़्त ने दिखाए इनके चेहरे,
कई रंगों में अपनी कहानी सूना गए!

गुज़रते समय के पन्नो
की एक किताब दिखाई दी,
कुछ पन्ने फटे,पुराने से,
कुछ नए करारे नज़र आये,
लब्ज़ उनमे  भी अपनी कहानी दोहरा गए,
दिल की स्याही के कई  रंग छलका गए।

इस स्याही   की दवात न जाने कितनी है गहरी,
लिखे हज़ारों शब्द ,
लेकिन न  होती फीकी,
दिखाती है अपना सुरूर ,
सुर्ख लाल सा
मखमली  है इसका रूप,
बेनजीर सा !

ज़िन्दगी के कागज़ के दिल पर
यह अपनी कहानी लिखती
रंग बिरंगे रंगों से उसे सजाती ,
बहती हुई कलम से
उभरे वो पन्नो पर,
जैसे बादलों से निकला हो चाँद ज़मीन पर!

 

Bachpan!

किनारे बैठे , रेत की बाहों में,
चुपके से सरक कर पानी की लहरों में ,
हो गया ओझल इन आँखों के झरोखे से,
वो नन्हा सा एक खिलता हुआ बचपन!
गीली रेत में घरोंदे बनाता ,
अपने नाम से उसे सजाता,
लहरें जब उसे मिटाती ,
फिर नन्हे हाथों से नया घर बनाता !
ना थकता कभी न होता मायूस,
करता कोशिश जब तक न बना मगरूर,
इस बचपन को समाये दिल में रखा था,
लगता है वो लहरों के साथ चला गया !
गर करू में कोशिश आ जाये वो ,
मन की गहराईयों में छुपा लूँ तोह,
फिर से खिल जाएगा ये चेहरा ,
जिसकी मुस्कान खो गयी थी यूँ !
फिर से मन  में  जज्बा होगा ,
ज़िन्दगी को नया रुख मिलेगा,
हँसते हँसते चलने का सबब ,
इस दिल को भी तो अच्छा लगेगा!

मन ! एक कमल !

कोमल कमल की पंखुरियों सा निर्मल,
खिलता ,प्रफुल्लित मन यह चितवन,
धरा की रेखाओं के आधीन ,
फिर भी उन्मुक्त  स्वाधीन स्वच्छ दर्पण
 
सदेव खिलता खिलखिलाता ,

अपने मन मोहक गीत सुनाता,
लुभावना सा यह कमल ,
सुवासित रहे वातारण .
 
 
कभी जो तूफ़ान में झुक के,
मुड़  जाए इसके डंठल ,
अगले पल अपने को संभाले,

खडा रहे यह मनभावन .
 
ऐसे निर्मल मन सा कोई हो जो कमल,
जीवन की डोर से फिर न टूटे ….
किसी की साहस का बंधन।