TUM !

दो पल का इंतज़ार न था,
यह सदियों की थी दूरी,
इन दिनों देता नहीं,
यह दिल किसी बात की मंजूरी …
हलके से, चुपके से ,
इन आँखों के झरोखे से ,
सपनो के बगीचे  में  ,

 जब तुम आते हो होले से ,
पलक झपकते ही हो जाते …
अन्तेरध्यान इन नज़रों से …
मंद मंद मुस्कुरा हम,

 

जीते हैं इन यादों के सहारे,

 

इस तमन्ना में,

 

की तुम आओगे जल्द ही पास हमारे।

 

 

PIYA!

सखी ऱी ! पिया न जाने मोहे मनन की बात ,
कह न सकू में बात यह मन की,
ना वोह समझे बात मिलन की,
कैसे कहूँ उन्हें यह उलझन सी!
सखी! री पिया न समझे बात !
इन नयनों में वोह ही बसे हैं दिन रात ,
आँखें मूंदू या फिर जागू हर रात ,
पलक झपकते जाने क्या हो जात !
सखी ! री ! कासे कहूँ यह बात!
फूल यह मन का खिलने को है तैयार,
देख इसे वोह ना समझे कोई बात ,
मुरझा के बैठा है यह अपने डाल !
सखी ! री पिया न समझे बात!
जाकर उनसे कह दो तुम एक बार ,
कहना पि से मिलने को हूँ तैयार ,
नदिया किनारे ..जिस घट पुष्प हज़ार ,
चाँद भी होगा जलने को तैयार …
सखी ! री ! बस कह दो यह बात!
अब न रह सकू उनके बिना एक रात,
आकर जला दे,
इस ज्योति की बात ,बनके दिया वह रख ले अपने पास!

Palaash ke patte!

Naa jaane kahan kho gaye,

woh patte palaash ke,

kisi kone mein chupe hue

unhe talaash le…

 

Unpar kahaani hai meri zindagi ki ,

chand lakiron mein likhi

magar phiki si,

shayad patjhad uda le gayi,

un patton ko is maqaam se…

 

Bas baithe hai intezaar mein..

 

 

yeh sochte hue,

koi laayega phir se unhe samet ke

par koi na mila jo padh sake …

dastaan woh  likhi hui…

na pahunch saka

kareeb us ke…

 

woh palaash ke patton

ab bhi kare hai intezaar

uda le jaaye phir saawan

ab ki chaukhat par, uske

jiska hume hai barson se intezaar…