मन ! एक कमल !

कोमल कमल की पंखुरियों सा निर्मल,
खिलता ,प्रफुल्लित मन यह चितवन,
धरा की रेखाओं के आधीन ,
फिर भी उन्मुक्त  स्वाधीन स्वच्छ दर्पण
 
सदेव खिलता खिलखिलाता ,

अपने मन मोहक गीत सुनाता,
लुभावना सा यह कमल ,
सुवासित रहे वातारण .
 
 
कभी जो तूफ़ान में झुक के,
मुड़  जाए इसके डंठल ,
अगले पल अपने को संभाले,

खडा रहे यह मनभावन .
 
ऐसे निर्मल मन सा कोई हो जो कमल,
जीवन की डोर से फिर न टूटे ….
किसी की साहस का बंधन।