कन्हैया

गोकुल में भयो बाल काल
ग्वाल बाल बने सखा
बांसुरी की धुन में
झूमे नन्द संग गोपियाँ

वृन्दावन की कुञ्ज गली में
राधा करे श्रृंगार
अपने आराध्य के रंग में
रंग  लियो अपना संसार

द्वारिका जो गए कन्हैया
मुड़ के देखो न एक बार
राधा ,संग गोपियों
पलके बिछाये हैं
यमुना पार!

सुनाके कान्हा एक धुन अनोखी
करदो सबके मन को शांत
झूमने लगे फिर से अम्बर
ऐसे राग को छेडो आज!

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Kanha!

शीश पर मोरमुकुट सजे,
होंठों पर बांसुरी सुरीली,
वृन्दावन के कुञ्ज गली में,
घर घर देखि मोहन की छवि!
चहुँ और है एक उजियारा,
हरी के नाम से गया अँधियारा,
नेत्रहीन सूरदास गाये,
गीत कान्हा के उपमाओं का।
क्या कहें मीरा की तान,
राधा भी झूमे मुरली में ध्यान,
प्रकृति के कण कण में बसा
वही एक कान्हा का नाम।
में तो देखू छाया उनकी ..
प्रत्येक जीव के रोम रोम में,
कान्हा तेरे दरस के लिए।।
वन वन घूमे बावरे.
कह दे तू कहाँ है छुपा
किस मन मंदिर में बसाए
अपना स्थान
इस क्षण में कहाँ है रमा।
किस कण में है तेरे प्राण!