“रंग गयी मैं तोरे रंग में,अब काहे तू सताये रे”

ना  बाँधों मोहे पीया प्रीत की डोर से
उलझन में यह नयन, मन सकुचाये
जब ना दिखे तू, तब काहे का चैन

हुई मैँ बावरी तोरी ,तू ना समझ  पाये रे

रंग गयी मैं तोरे  रंग में, अब काहे तू सताये  रे

ना तोड़ पाऊँ, ना तोसे दूर् जाऊँ
कैसो यह अनोखा बंधन हाय  रे
जले तू ,तो जलूँ मैँ
रुके तू तो: रुकूँ मैँ
चले तू  तो चलूँ मैँ

कैसे कहूँ पिया, तोसे यह बात

हुई मैँ बावरी तोरी ,तू ना समझ पाये…

रंग गयी मैं तोरे  रंग में, अब काहे तू सताये  रे

कन्हैया

गोकुल में भयो बाल काल
ग्वाल बाल बने सखा
बांसुरी की धुन में
झूमे नन्द संग गोपियाँ

वृन्दावन की कुञ्ज गली में
राधा करे श्रृंगार
अपने आराध्य के रंग में
रंग  लियो अपना संसार

द्वारिका जो गए कन्हैया
मुड़ के देखो न एक बार
राधा ,संग गोपियों
पलके बिछाये हैं
यमुना पार!

सुनाके कान्हा एक धुन अनोखी
करदो सबके मन को शांत
झूमने लगे फिर से अम्बर
ऐसे राग को छेडो आज!

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