पंख

पंख लगा के आसमान में उड जाऊँ
चाहे यह मन चकोर
देख् नील गगन का उजियारा
नाचे जैसे वन में चंचल मोर!

कहे है बावरा उसे ,
फिरभी ना समझे यह मन
उड़ते बादलों से बंध जाए
रह रह कर यह दिल कि डोर !

आ जाएँ कहीं बनाये बसेरा
जब होगी शाम चहुं ओर
थम जाए कुछ पल के लिए,
जब तक ना समझे यह पागल मन चितचोर!

UD JAA!

पवन की चाल चलता ,तीव्र गति से उड़ता ,
पंख लिए सपनो के ,
मन यह चंचल सा !
 
 सफ़ेद  अश्व पर हो सवार जैसे कोई सतरंगी सपना,
 आँधियों  को चीरता  हुआ ,
आसमान में उड़े यह गीत नया सा!
 
 
 
जज्बा कोई दिल में हो रंग भले ही कोमल ,
धड़कन में वह जान संजोये ,
लेता है अपनी डगर !
 
किस डर में जिए तू ऐ मन  ,
किसके लिए सजाये,
सपनों को तू भो पंख लगाकर,
उड़ जा देश पराये! 

Kanha!

शीश पर मोरमुकुट सजे,
होंठों पर बांसुरी सुरीली,
वृन्दावन के कुञ्ज गली में,
घर घर देखि मोहन की छवि!
चहुँ और है एक उजियारा,
हरी के नाम से गया अँधियारा,
नेत्रहीन सूरदास गाये,
गीत कान्हा के उपमाओं का।
क्या कहें मीरा की तान,
राधा भी झूमे मुरली में ध्यान,
प्रकृति के कण कण में बसा
वही एक कान्हा का नाम।
में तो देखू छाया उनकी ..
प्रत्येक जीव के रोम रोम में,
कान्हा तेरे दरस के लिए।।
वन वन घूमे बावरे.
कह दे तू कहाँ है छुपा
किस मन मंदिर में बसाए
अपना स्थान
इस क्षण में कहाँ है रमा।
किस कण में है तेरे प्राण!