चित्त की सुनो

) चित्त की  सुनो रे मनवा
चित्त की  सुनो
बाहर घोर अंध्काल
संभल कर चलो …

राह् कई है, अनजानी सी
देख् पग धरो, रे मनवा
चित्त की  सुनो…

अज्ञान- के कारे बादल
गरजे बरसें बिन कोई मौसम
आपने मन की  लौ को जगा कर
रखना तू हर पल
रे मनवा ,चित्त की  सुनो…

ऐसे चित्त का चित्त रमाये ध्यान करे  हरि का
भव्सागर पार हो जाए
कलयुग में
जगा कर रोम रोम और प्राण
रे मनवा ,

चित्त की सुनो हर बार

अपने अपने हिस्से का आसमान

वो नीला आसमान ,
कुछ तेरा , कुछ मेरा
बाँट लिया आपस में
हमने अपने हिस्से का आसमान
कई रंग के ख्वाब यहाँ …
जीने के हजारों मक़ाम…

तेरी जेब में दुनिया को खरीदने का सारा सामान
मैंने भी जोड़े चंद सिक्के ,
अपनाने कुछ ऐश ओ आराम ..

पर वो शक़्स रहता जो
खुले आसमान के तले
ना जुटा पाया कुछ सामान
ना पहचाने दुनिया उसे ,
ना अपनाये अपनों में कहाँ

छीन गयी जिसकी
एक बिघा ज़मीन
ढोये वो बोझ, गैरों का यहाँ …
वो राह् पर भूकाबैठा …
तू चटकारे लगाये यहाँ …

क्या खूब जिया तू इनसान
कैसा यह फ़ासला …
इनसान …तू
इनसान से जुदा यहाँ !

उस अनपढ़ , के हाथों
ना दी किसी ने एक
कलम और किताब
छीन लिया बचपन
थमा दी लाठी
दूर् कर
भेद कर
अलग कर
इनसान को ,
इनसान से यहाँ…
बस
बाँट लिया आपस में हमने
अपने अपने हिस्से का आसमान !

रंगरेज

तक़दीर मेरी क्या रंग लाती है
तेरे दर पर आने के बाद
तारे गिन गिन हो गई सुबह
कहता यह दिल
मत कर नादानियाँ…

वो थाम ले जो हाथ तेरा
अंबर तक चले जाना
जो ना नजर मिलाये तो
चाँद को धरती पर बुला लाना…

आँखों में ख्वाब  बेशुमार
हलका सा  खुमार
ग़र हम है तेरे रंगरेज
तुझ पर भी चदा होगा
मोहब्बत का बुखार

घोंसला

आज तूफान आया था घर के बरामदे मेँ
उजड़ गया तिनकों का महल एक ही झोंके मेँ
उस चिड़िया की आवाज़ आज ना सुनायी दी
कई दिनो से
शायद
फिर से जूट गयी बेचारी सब सँवारने मेँ

बनते बिगड़ते हौंसले से बना फिर वो घोंसला
पर किसी को ना दिखा चिड़िया का वो टूटता पंख नीला
अब कैसे वो उड़े नील गगन में
जहाँ बसते थे उसके अरमान !
सबर का इम्तिहान उसने भी दिया
बचा लिया घरौंदा…
मगर कुर्बान ख़ुद को किया

ऐ मन , तू है चिरायु!

घने बादलों के साये मँडराते है आज
चहुं ओर छाया है अन्धेरा
ना कोइ रौशनी , ना कोई आस्
फिर भी चला है यह मन अकेला.

ना डरे यह काले साये से
ना छुपा सके इसे कोहरा
अपनी ही लौ से रोशन करे यह दुनिया
चले अपनी डगर…
हो अडिग, फिर भी अकेला …

ना झुकता है यह मन किसी तूफान में
ना टूटे होंसला इसका कभी कही से
एक तिनके को भी अपनी उम्मीद बना ले…
ऐसा है विश्वास बांवरे मन का…

ना थके वो , ना रुके वो
मंज़िल है दूर् , दूर् है सवेरा
चला जाए ऐसे, पथ पर निरंतर
ऐ मन , तू है चिरायु …

खामोशी

एक ज़ुबान हम जानते हैं
खामोशी है जिसका नाम
नजरें करे गुस्ताखिया
चाँद फिर भी दिखे अनजान
छुपकर बादलों में पलक झपकाये बार बार
कभी ओस की बूँदों में छलके
कभी बारिश की बूँदों में दिखाये अपना प्यार

ऐ नौजवानों !

 

संभल कर रहना ऐ नौजवानों
कहीं अंधेरों में ना भटक जाना तुम
दूर् के नज़ारोन से
कहीं भ्रमित ना होना तुम .

होना तुम डटकर खड़े
अपने सच्चाई की लड़ाई में
हाथ थामना कमजोर का
चलना अपनी डगर पर होकर निर्भय …

संभलना इनसान के वेश में बैठे उस जल्लाद से
जिसकी नजरें हैं टिकी तुम्हारे शांत , कोमल मन के अज्ञान- पे
तुमसे ही है इस धरती का भविष्य
तुमसे ही है आस् सभी को
जो तुम भटक जाओ स़फर में
लानत है हमारे संस्कार पर !

खड़े हैं हाथ में लिए यह कमान
थामने तुम्हे गर्व से
संभलना ऐ नौजवानों
इस देश के धरोहर को सम्मान से

मुक्ति

किस मुक्ति की बात करे है तू
जब मन ही नहीं मुक्त संसार से
कहाँ जाए काशी , काबा
जब फँसा हो मन इस मायाजाल में …

मुक्त कभी नहीं ,तू हो सकता
अगर त्याग दिया यह वेश भी
वरना कोइ संत , सूफी ना कहता
जो है, बस यही सही …
घाट घाट का पानी पीया
फिर भी ना जाना यह बात अभी ?
मरने से मुक्ति नहीं मिलती, ऐ राहगीर .
जब तक ना बने ,उन्मुक्त,तू ही !