MAN MEIN BASANT

अम्बुआ की डाली पर
बैठी कोयल गा रही मल्हार ,
सुना रही हमे गीत लिए प्यार की पुकार ,
चहू और है बसंत का मौसम मनमोहक
है सारा जहां …
दखे इसे मन नाच उठा जैसे,
पायल की झंकार …
सुगंध फैली है जैसे की कस्तूरी मृग
का सुवास,
दूँ ढ रहा जैसे वन उपवन में
लिए अपने भीतर
ही जिसका वास …
रंग बिरंगे फूलों से सजा है ,
यह सारा निरIंकार ,
मानो धरती कर रही हो जैसे
कोई अमृत संचार …