चाँद !

ढलते हुए सूरज ने कहा,
ऐ ! चाँद आ अब तू कर रोशन यह जहाँ ,
बिखेर कर अपनी चांदनी यहाँ,
बाँध ले यूँ अपना समां !
 
यह रात है  चार पहर की,
जला के अंधियारों  में दिए,
तू बन जा इस जहाँ का
सब से प्यारा मितवा!
 
फिर सुबह की किरणों से,
यह खो जाएगा आसमान,
जहां चाँद होता है ज़मीन पर ,
तारे जगमगाते  आसमान !
 
 

PIYA!

सखी ऱी ! पिया न जाने मोहे मनन की बात ,
कह न सकू में बात यह मन की,
ना वोह समझे बात मिलन की,
कैसे कहूँ उन्हें यह उलझन सी!
सखी! री पिया न समझे बात !
इन नयनों में वोह ही बसे हैं दिन रात ,
आँखें मूंदू या फिर जागू हर रात ,
पलक झपकते जाने क्या हो जात !
सखी ! री ! कासे कहूँ यह बात!
फूल यह मन का खिलने को है तैयार,
देख इसे वोह ना समझे कोई बात ,
मुरझा के बैठा है यह अपने डाल !
सखी ! री पिया न समझे बात!
जाकर उनसे कह दो तुम एक बार ,
कहना पि से मिलने को हूँ तैयार ,
नदिया किनारे ..जिस घट पुष्प हज़ार ,
चाँद भी होगा जलने को तैयार …
सखी ! री ! बस कह दो यह बात!
अब न रह सकू उनके बिना एक रात,
आकर जला दे,
इस ज्योति की बात ,बनके दिया वह रख ले अपने पास!