लिहाफ

रफ्ता रफ्ता यह ख्याल आता है दिल में
इस गुलाबी ठण्ड के ठिठुरते पलों में
सिली सिली यादों का एक मखमली लिहाफ
ओढ़ लूँ
कुछ पल के लिए

कुछ सेंक लूँ, बर्फ से हालत
कुछ ताप लूँ ,अपने जज़्बात
फिर मिलते है ,अगले मौसम में
लिए एक नया तारकशी का लिहाफ

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खोज

चंद पल सुकून के खोजता रहा उम्र भर
कभी अपने पैरों के निशाँ पोंछ कर
कभी परिंदे सी उड़ान भर कर
दूर दराज़ जंगलों में
बड़ी बड़ी इमारतों के मंज़िलों पर
खोती गयी मंज़िल अपनी
इस पशोपेश में
भूल गया
झाँकना अपने ही भीतर
ज़िन्दगी के घुमते पहिये संग

Soumya

वह सोचते हैं

गम उन्हीं की कश्ती का हमसफर है

कौन समझाए हमने तो

जुबान पर मुसकुराहट पहनी है

गर बयान करे हाल ए दिल

तो तुफान आजाए

कश्ती हमारी तो पहले से

मझधार में फँसी है.

©soumya

फुरसत

मेरी आँखों की गहराई में
झांकने की तुझे फुरसत कहाँ
जश्न -ए -ईद
मौसम -ए- मातम
में बस य़ुहीं गुज़र गयी
दीद की रात

© सौम्या

यह खामोशी कैसी

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वह जो बैठे हैं
हथेली पर चंद पलों को लिए
उम्र गुज़र गयी ,तरस गयी आँखें
एक दरस के लिए
शाम सुर्ख फिर भी
फूल यूँ ही मुरझा गए

वक़्त की बेड़ियों ने बाँधी
यह खामोशी कैसी
चलो फिर इंतज़ार करे
यूँ ही चाँद का
सितारों के परे आसमान में

©All rights reserved SoumyaVilekar

कैसे कहे चाँद से

कैसे कहे चाँद से

रात की चांदनी उससे  अलग नहीं

चाहे हो दिन या सितारों का मज़मा

रौशनी रूह की

जलती है अंदर ही

 

©Soumya

जुबां हमारी ना समझ सका है कोई
आँखों की गहराई
जानने की
फुर्सत किसी को नहीं